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एसआईपी की तारीख: क्या महीने का दिन रिटर्न बदलता है?

एसआईपी के लिए कौन सी तारीख सबसे अच्छी है? जानें 5 बनाम 25 तारीख पर पुराने आंकड़े क्या कहते, NAV कट-ऑफ कैसे काम करता है और ऐसी तारीख कैसे चुनें जो बाउंस न हो।

लेखक: Moksh Shahअपडेट: 7 मिनट में पढ़ें
एसआईपी की तारीख: क्या महीने का दिन रिटर्न बदलता है?
इस लेख में
  1. लोग क्यों सोचते हैं कि तारीख मायने रखती है
  2. आंकड़े क्या कहते हैं
  3. उदाहरण से समझें: दो तारीखें, छह महीने
  4. असली नुकसान किससे होता है: फेल हुआ डेबिट
  5. एसआईपी में NAV की टाइमिंग कैसे काम करती है
  6. एसआईपी की तारीख चुनने के लिए व्यावहारिक चेकलिस्ट
  7. एसआईपी की तारीख कैसे बदलें
  8. मुख्य बातें
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लंबी अवधि के निवेशकों के लिए एसआईपी (SIP) की तारीख से रिटर्न में बहुत कम फर्क पड़ता है। भारतीय इंडेक्स के आंकड़ों पर 5, 15 और 25 तारीख जैसी तारीखों की तुलना करने वाली स्टडी में सालाना एक प्रतिशत अंक के छोटे से हिस्से जितना फर्क मिला है, और "जीतने वाली" तारीख एक दौर से दूसरे दौर में बदल जाती है। इससे कहीं ज्यादा जरूरी यह है कि डेबिट कभी फेल न हो, इसलिए सैलरी आने के कुछ दिन बाद की तारीख चुनें और एसआईपी चालू रखें।

लोग क्यों सोचते हैं कि तारीख मायने रखती है

बाजार हर दिन ऊपर-नीचे होता है, इसलिए 5 तारीख का NAV शायद ही कभी 25 तारीख जैसा होता है। किसी एक महीने में कोई एक तारीख दूसरी से बेहतर दिखेगी ही। ऐसे में यह मान लेना आसान है कि कोई खास दिन, जैसे महीने का आखिर, डेरिवेटिव एक्सपायरी वाला हफ्ता, या सैलरी से आने वाले पैसे के बाद महीने की शुरुआत, लगातार सस्ता रहता है।

दिक्कत यह है कि ऐसे पैटर्न, अगर होते भी हैं, तो छोटे और अस्थिर होते हैं। सैकड़ों किस्तों में एक महीने का सस्ता दिन दूसरे महीने के महंगे दिन से बराबर हो जाता है।

आंकड़े क्या कहते हैं

कई भारतीय विश्लेषणों ने पुराने इंडेक्स आंकड़ों से इसकी जांच की है। PrimeInvestor की एक स्टडी ने 2008 से 2022 के बीच पांच, दस और पंद्रह साल की अवधि में Nifty 100 और Nifty 500 में 5, 15 और 25 तारीख की एसआईपी की तुलना की। उनके सैंपल में 25 तारीख थोड़ी आगे रही, लेकिन लेखकों ने साफ कहा कि फर्क इतना छोटा था कि इसे सबसे अच्छी तारीख नहीं कहा जा सकता। उनके एक उदाहरण में जनवरी 2011 से दिसंबर 2020 तक Nifty 100 में ₹10,000 की मासिक एसआईपी (कुल ₹12 लाख निवेश) 15 तारीख पर करीब ₹22.05 लाख और 25 तारीख पर करीब ₹22.09 लाख हुई, यानी आखिरी रकम का 0.2% से भी कम फर्क।

दस साल की एसआईपी पर दूसरे प्लेटफॉर्म के विश्लेषण भी ऐसे ही नतीजे बताते हैं: तारीखों के बीच कुछ बेसिस पॉइंट से लेकर सालाना करीब चौथाई प्रतिशत अंक तक का फर्क, और शुरुआती साल के हिसाब से रैंकिंग बदलती रहती है।

ऐसी सभी स्टडी पर दो सावधानियां लागू होती हैं:

  • ये पुराने आंकड़ों पर आधारित हैं। जो तारीख एक दशक में थोड़ी बेहतर रही, उसके आगे भी बेहतर रहने की कोई वजह नहीं है। पिछला रिटर्न भविष्य के रिटर्न की गारंटी नहीं है।
  • इंडेक्स का डेटा आपका फंड नहीं है। आपके असली फंड, उसके खर्च और उसके NAV की टाइमिंग से भी अपना असर पड़ता है।

उदाहरण से समझें: दो तारीखें, छह महीने

यहां काल्पनिक NAV के साथ एक आसान उदाहरण है। आप एक ही फंड में छह महीने तक हर महीने ₹5,000 निवेश करते हैं, या तो 5 तारीख को या 25 तारीख को। आखिर में NAV ₹110 है।

महीना 5 तारीख का NAV (₹) 5 तारीख की यूनिट 25 तारीख का NAV (₹) 25 तारीख की यूनिट
1 100 50.00 98 51.02
2 96 52.08 99 50.51
3 102 49.02 101 49.50
4 98 51.02 103 48.54
5 105 47.62 104 48.08
6 108 46.30 107 46.73
कुल 296.04 294.38
  • 5 तारीख वाली एसआईपी: ₹30,000 ÷ 296.04 = औसत लागत ₹101.34; वैल्यू 296.04 × ₹110 = ₹32,564।
  • 25 तारीख वाली एसआईपी: ₹30,000 ÷ 294.38 = औसत लागत ₹101.91; वैल्यू 294.38 × ₹110 = ₹32,382।

फर्क ₹182 है, यानी वैल्यू का करीब 0.6%, और यह पूरी तरह इस बात से आया कि इन छह महीनों में NAV कहां रहे। आंकड़े बदल दें तो 25 तारीख जीत जाएगी। 240 किस्तों वाली 20 साल की एसआईपी में महीने-दर-महीने के ये संयोग काफी हद तक बराबर हो जाते हैं।

असली नुकसान किससे होता है: फेल हुआ डेबिट

तारीख के इस छोटे असर की तुलना उससे करें जो डेबिट फेल होने पर होता है। अगर आपकी एसआईपी की तारीख सैलरी आने से पहले पड़ती है, तो किस्त बाउंस हो सकती है। आपका बैंक मैंडेट-रिटर्न फीस ले सकता है, किस्त निवेश नहीं होती, और बार-बार फेल होने पर एएमसी एसआईपी कैंसल कर सकती है।

12% सालाना रिटर्न (मासिक कंपाउंडिंग) मानकर, हर समस्या का पैमाना एक उदाहरण के तौर पर:

  • 240 महीने तक ₹10,000 की एसआईपी करीब ₹99,91,479 हो जाती है:
    • i = 0.01, (1.01)^240 = 10.8926
    • [(10.8926 − 1) ÷ 0.01] × 1.01 × ₹10,000 = ₹99,91,479
  • अगर हर किस्त महीने में करीब 20 दिन बाद निवेश होती, तो आखिरी वैल्यू लगभग ₹99,29,600 होती, यानी करीब 0.6% कम।
  • लेकिन अगर बाउंस और कैंसल हुई एसआईपी की वजह से शुरुआत में आपकी एक साल की किस्तें छूट जाती हैं, तो आप सिर्फ ₹1.2 लाख का योगदान ही नहीं, बल्कि बाकी सालों में उस पर मिलने वाली कंपाउंडिंग भी खो देते हैं।

ये स्थितियां आप एसआईपी कैलकुलेटर में आजमा सकते हैं। सीख यह है कि तारीख चुनने से ज्यादा जरूरी भरोसेमंद डेबिट है।

1 फरवरी 2021 से सेबी (SEBI) के नियमों के मुताबिक आपको मिलने वाला NAV इस पर निर्भर करता है कि पैसा फंड हाउस तक कब पहुंचा, न कि आपने ऑर्डर कब दिया। इक्विटी और ज्यादातर दूसरी नॉन-लिक्विड स्कीमों में, अगर किसी कामकाजी दिन दोपहर 3 बजे के कट-ऑफ से पहले पैसा एएमसी के खाते में आ जाता है, तो उसी दिन का NAV मिलता है; 3 बजे के बाद अगले कामकाजी दिन का NAV। यह हर रकम पर लागू होता है।

एसआईपी में डेबिट आपकी चुनी हुई तारीख को शुरू होता है, और पैसा आम तौर पर क्लियरिंग सिस्टम से होकर एएमसी तक पहुंचता है। यूनिट उस दिन अलॉट होती हैं जिस दिन पैसा पहुंचता है, जो एसआईपी की तारीख या उसके बाद का कोई कामकाजी दिन हो सकता है। अगर तारीख पर छुट्टी या वीकेंड है, तो प्रोसेसिंग आम तौर पर अगले कामकाजी दिन होती है। इनमें से कुछ भी छूटी हुई किस्त नहीं माना जाता।

एसआईपी की तारीख चुनने के लिए व्यावहारिक चेकलिस्ट

बात क्या करें
सैलरी आने की तारीख देरी की गुंजाइश रखते हुए, आम तौर पर सैलरी आने के 2–5 दिन बाद की तारीख चुनें
दूसरे ऑटो-डेबिट ईएमआई और एसआईपी की तारीखें अलग रखें, या पक्का करें कि बैलेंस सबके लिए काफी हो
महीने के आखिर की तारीखें कुछ एएमसी या प्लेटफॉर्म सिर्फ 1–28 तारीख की इजाजत देते हैं; 29–31 चुनने से पहले जांच लें
कई एसआईपी सबको एक ही तारीख पर रखना ठीक है, अगर बैलेंस कुल रकम के लिए काफी हो
अनियमित आय ऐसी तारीख चुनें जब आम तौर पर सबसे ज्यादा पैसा हो, या हर महीने मैनुअल निवेश पर विचार करें

क्या एक एसआईपी को कई तारीखों में बांटना चाहिए?

₹10,000 को 5 तारीख पर ₹5,000 और 20 तारीख पर ₹5,000 में बांटने से हर महीने आपकी खरीद थोड़ी और फैल जाती है। पुराने आंकड़े बताते हैं कि लंबी अवधि में इसका फायदा न के बराबर है, और फेल हो सकने वाले डेबिट दोगुने हो जाते हैं। यह पसंद की बात है, रिटर्न बढ़ाने की रणनीति नहीं।

मासिक की जगह साप्ताहिक या रोजाना एसआईपी?

कुछ प्लेटफॉर्म साप्ताहिक या रोजाना एसआईपी की सुविधा देते हैं। इनसे खरीद और बारीकी से फैलती है, लेकिन लंबी अवधि में स्टडी आम तौर पर रिटर्न को मासिक एसआईपी के करीब ही पाती हैं। इनसे आपके स्टेटमेंट में ट्रांजैक्शन भी कई गुना हो जाते हैं। ज्यादातर नौकरीपेशा निवेशकों के लिए मासिक एसआईपी ही सबसे आसान विकल्प है।

एसआईपी की तारीख कैसे बदलें

ज्यादातर एएमसी और प्लेटफॉर्म चल रही एसआईपी की तारीख बदलने नहीं देते। आम तरीका:

  1. उसी स्कीम में नई तारीख पर नई एसआईपी रजिस्टर करें, पुराने या नए मैंडेट से।
  2. पुरानी एसआईपी कैंसल करें। कैंसलेशन में कुछ दिन लग सकते हैं, इसलिए पुरानी तारीख से काफी पहले यह कर दें।
  3. अगला स्टेटमेंट जांचें ताकि पक्का हो कि पैसा दो बार नहीं कटा, या कोई महीना छूटा नहीं।

ऑनलाइन एसआईपी कैसे शुरू करें वाली हमारी गाइड में मैंडेट और प्लेटफॉर्म की जानकारी है, और एसआईपी की शुरुआती गाइड बताती है कि किस्तों से यूनिट कैसे खरीदी जाती हैं।

मुख्य बातें

  • भारतीय इंडेक्स के पुराने आंकड़ों पर हुई स्टडी में एसआईपी की तारीखों के बीच सिर्फ छोटा फर्क मिला है, और सबसे अच्छी तारीख जांचे गए दौर के हिसाब से बदल जाती है।
  • छह महीने के उदाहरण में 25 की जगह 5 तारीख चुनने से वैल्यू में करीब 0.6% फर्क आया; 20 साल में ऐसे असर काफी हद तक बराबर हो जाते हैं।
  • बाउंस या कैंसल हुई एसआईपी "खराब" तारीख से कहीं ज्यादा महंगी पड़ती है, इसलिए सैलरी आने के कुछ दिन बाद की तारीख चुनें।
  • सेबी के नियमों के मुताबिक यूनिट उस दिन के NAV पर मिलती हैं जिस दिन पैसा एएमसी तक पहुंचता है, और इक्विटी स्कीमों के लिए कट-ऑफ दोपहर 3 बजे है।
  • तारीख बदलने के लिए नई एसआईपी रजिस्टर करें और पुरानी कैंसल करें; कोई भी तारीख चुनें, रिटर्न की गारंटी कभी नहीं होती।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

एसआईपी के लिए कौन सी तारीख सबसे अच्छी है?

कोई भी तारीख पक्के तौर पर सबसे अच्छी नहीं है। भारतीय इंडेक्स के लंबे समय के आंकड़ों पर हुई स्टडी में 5, 15 और 25 तारीख जैसी तारीखों के बीच बहुत छोटा फर्क मिला है। व्यावहारिक रूप से सबसे अच्छी तारीख वह है जो सैलरी आने के कुछ दिन बाद हो, ताकि डेबिट कभी फेल न हो।

क्या एसआईपी की तारीख से रिटर्न पर असर पड़ता है?

एक-दो साल में तारीख से फर्क दिख सकता है, क्योंकि एक महीने के अंदर बाजार काफी ऊपर-नीचे होता है। दस साल या उससे ज्यादा में पुराने आंकड़ों में यह फर्क छोटा रहा है, आम तौर पर सालाना एक प्रतिशत अंक का छोटा सा हिस्सा, और यह अलग-अलग दौर में बदलता रहता है।

क्या मैं अपनी एसआईपी की तारीख बदल सकता हूं?

ज्यादातर एएमसी और प्लेटफॉर्म चल रही एसआईपी की तारीख सीधे बदलने नहीं देते। आम तरीका यह है कि नई तारीख पर नई एसआईपी रजिस्टर करें और पुरानी कैंसल करें, और ध्यान रखें कि एक ही महीने में दोनों न कटें, जब तक आप दो डेबिट न चाहते हों।

क्या एक एसआईपी को कई तारीखों में बांटना बेहतर है?

₹10,000 की एसआईपी को अलग-अलग तारीखों पर ₹5,000 की दो एसआईपी में बांटने से खरीद थोड़ी और फैल जाती है, लेकिन पुराने आंकड़ों में लंबी अवधि का फायदा बहुत कम दिखा है। इससे मैंडेट और डेबिट भी ज्यादा हो जाते हैं जिन पर नजर रखनी पड़ती है।

अगर एसआईपी की तारीख पर छुट्टी हो तो क्या होगा?

किस्त आम तौर पर अगले कामकाजी दिन प्रोसेस होती है, और यूनिट उस दिन के NAV पर मिलती हैं जिस दिन पैसा फंड हाउस तक पहुंचता है। इसे छूटी हुई किस्त नहीं माना जाता।

यह लेख केवल सामान्य जानकारी के लिए है, निजी वित्तीय, टैक्स या कानूनी सलाह नहीं। कोई भी फैसला लेने से पहले अपने बैंक, लेंडर या योग्य सलाहकार से पुष्टि करें।

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