धीमा बिकने वाला स्टॉक: बैंक स्टॉक स्टेटमेंट सही कैसे बनाएं
बैंक स्टॉक स्टेटमेंट में धीमा बिकने वाला और पुराना स्टॉक कैसे दिखाएं: एजिंग, वैल्यूएशन, ₹40 लाख का ड्रॉइंग पावर उदाहरण और आरबीआई के 90 दिन के नियम।

इस लेख में
सही स्टॉक स्टेटमेंट धीमे बिकने वाले और पुराने माल को उम्र के हिसाब से अलग दिखाता है और उनका मूल्य वही लगाता है जो उनसे असल में मिलेगा, न कि जो आपने चुकाया था। इससे आपकी ड्रॉइंग पावर आम तौर पर थोड़ी घटती है, लेकिन कैश क्रेडिट खाता नियमित रहता है, स्टॉक ऑडिट में दिक्कत नहीं आती और बैंक के सामने आपकी साख बनी रहती है। ज्यादा उधार लेने के लिए पुराने स्टॉक को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाना कैश फ्लो की समस्या को डिफॉल्ट में बदलने का सबसे तेज रास्ता है।
यह गाइड उदाहरण के साथ बताती है कि इन्वेंटरी की एजिंग कैसे करें, मूल्य कैसे तय करें और कैसे पेश करें। आपके बैंक के मार्जिन और एजिंग कट-ऑफ आपके सैंक्शन लेटर में होते हैं।
स्टॉक स्टेटमेंट इतना अहम क्यों है
स्टॉक और उधारी के आधार पर कैश क्रेडिट या ओवरड्राफ्ट में बैंक मासिक स्टॉक स्टेटमेंट से आपकी ड्रॉइंग पावर (DP) निकालता है। अक्टूबर 2026 की स्थिति में, आरबीआई के कमर्शियल बैंक – इनकम रिकग्निशन, एसेट क्लासिफिकेशन एंड प्रोविजनिंग डायरेक्शंस, 2025 कहते हैं:
- ड्रॉइंग पावर चालू स्टॉक स्टेटमेंट पर आधारित होनी चाहिए, और जिस स्टेटमेंट पर भरोसा किया जाए वह तीन महीने से पुराना नहीं होना चाहिए।
- पुराने स्टेटमेंट से निकली ड्रॉइंग पावर पर आधारित बकाया अनियमित माना जाता है।
- अगर किसी वर्किंग कैपिटल खाते में लगातार 90 दिन अनियमित निकासी होने दी जाए तो वह NPA बन जाता है, और अगर कैश क्रेडिट खाते का बैलेंस लगातार 90 दिन मंजूर लिमिट या ड्रॉइंग पावर से ऊपर रहे तो वह "आउट ऑफ ऑर्डर" है।
इसलिए स्टेटमेंट सिर्फ कागजी काम नहीं है; यही तय करता है कि आप कितना निकाल सकते हैं और आपका खाता स्टैंडर्ड रहेगा या नहीं।
स्टेप 1: इन्वेंटरी की एजिंग करें
अपने इन्वेंटरी सॉफ्टवेयर में आइटम-वार आखिरी मूवमेंट की तारीख या खरीद की तारीख (फर्स्ट-इन, फर्स्ट-आउट) देखें। स्टॉक को इन समूहों में बांटें:
| उम्र का समूह | आम तौर पर मतलब | आम बैंक व्यवहार (सैंक्शन लेटर देखें) |
|---|---|---|
| 0-90 दिन | सामान्य चालू स्टॉक | योग्य, सामान्य मार्जिन |
| 91-180 दिन | धीमा बिकने वाला | अक्सर योग्य, कभी-कभी ज्यादा मार्जिन |
| 181-365 दिन | बहुत धीमा | अक्सर बाहर या भारी मार्जिन |
| 365 दिन से ज्यादा / बेकार | डेड स्टॉक, एक्सपायर्ड, खराब, पुराने मॉडल | आम तौर पर बाहर |
वह स्टॉक भी अलग करें जिसे आप गिरवी नहीं रख सकते: दूसरों के लिए कंसाइनमेंट या जॉब वर्क पर रखा माल, बिक चुका लेकिन अभी डिलीवर न हुआ माल, और वह माल जिसका मालिकाना हक अभी आपके पास नहीं आया।
स्टेप 2: असली मूल्य लगाएं
भारतीय अकाउंटिंग स्टैंडर्ड (AS 2 / Ind AS 2) के तहत इन्वेंटरी लागत और नेट रियलाइजेबल वैल्यू (NRV) में से कम पर आंकी जाती है। NRV यानी अनुमानित बिक्री कीमत घटाकर उसे पूरा करने और बेचने की लागत। बैंक आम तौर पर स्टॉक को लागत या बाजार कीमत में से जो कम हो, उस पर आंकते हैं।
धीमे बिकने वाले आइटम के लिए खुद से पूछें: "अगर इसे 60 दिन में बेचना पड़े तो कितना मिलेगा?" बेकार स्टॉक को अपनी किताबों और स्टेटमेंट दोनों में उसी आंकड़े तक घटाएं।
उदाहरण: सही बनाम बढ़ा-चढ़ाकर बना स्टेटमेंट
जोशी इलेक्ट्रिकल्स, उदाहरण आंकड़े। सैंक्शन लेटर: कैश क्रेडिट लिमिट ₹35 लाख, स्टॉक और उधारी पर 25% मार्जिन, 180 दिन से पुराना स्टॉक और 90 दिन से पुरानी उधारी योग्य नहीं।
लागत पर स्टॉक: ₹40 लाख
| समूह | लागत | असली मूल्य | DP के लिए योग्य? |
|---|---|---|---|
| 0-90 दिन | ₹26,00,000 | ₹26,00,000 | हां |
| 91-180 दिन | ₹8,00,000 | ₹8,00,000 | हां |
| 181-365 दिन | ₹4,00,000 | ₹3,00,000 | नहीं |
| 365 दिन से ज्यादा (पुराने मॉडल) | ₹2,00,000 | ₹50,000 | नहीं |
| कुल | ₹40,00,000 | ₹37,50,000 |
बाकी आंकड़े: 90 दिन से कम की उधारी ₹15 लाख; ट्रेड क्रेडिटर्स ₹9 लाख; कैश क्रेडिट बकाया ₹33 लाख।
सही ड्रॉइंग पावर:
- योग्य स्टॉक: ₹26 लाख + ₹8 लाख = ₹34 लाख
- उधारी ₹15 लाख जोड़ें, क्रेडिटर्स ₹9 लाख घटाएं = ₹40 लाख
- DP = ₹40 लाख × 75% = ₹30 लाख
अगर पूरा स्टॉक लागत पर ताजा दिखाया जाता:
- ₹40 लाख + ₹15 लाख − ₹9 लाख = ₹46 लाख × 75% = ₹34.5 लाख
बढ़ा-चढ़ाकर बना स्टेटमेंट DP को ₹4.5 लाख ज्यादा दिखाता है। ₹33 लाख बकाया के साथ, सच्ची तस्वीर यह है कि खाता ड्रॉइंग पावर से ₹3 लाख ऊपर है।
अंतर कैसे भरें
जोशी इलेक्ट्रिकल्स पुराना स्टॉक निकालती है: 181-365 दिन वाले आइटम ₹3 लाख में और पुराने मॉडल ₹50,000 में बिकते हैं। ₹3.5 लाख कैश क्रेडिट खाते में जाते हैं, जिससे बकाया ₹29.5 लाख रह जाता है, जो ₹30 लाख DP से कम है। चूंकि बेचे गए आइटम पहले से DP से बाहर थे, इस बिक्री से ड्रॉइंग पावर नहीं घटती। ₹2.5 लाख का किताबी घाटा (₹6 लाख लागत घटाकर ₹3.5 लाख प्राप्ति) असली है, लेकिन आउट-ऑफ-ऑर्डर खाते से कहीं सस्ता है।
ये आंकड़े हर महीने अपने दूसरे अहम आंकड़ों के साथ ट्रैक करें; देखें छोटे बिजनेस के मासिक वित्तीय आंकड़े।
अच्छे स्टॉक स्टेटमेंट में क्या होता है
- स्टेटमेंट की तारीख (महीने के आखिरी दिन का स्टॉक) और जमा करने की तारीख
- कैटेगरी-वार या आइटम-समूह-वार मात्रा, दर और मूल्य, वैल्यूएशन का आधार लिखा हुआ
- स्टॉक के उम्र के समूह, धीमा बिकने वाला और बेकार माल अलग से
- स्टॉक की जगह (गोदाम, दुकान, फैक्ट्री, रास्ते में) और रास्ते में माल अलग से
- जो स्टॉक आपका नहीं है (कंसाइनमेंट, जॉब वर्क) बाहर या अलग से
- उधारी की एजिंग, बड़ी रकम के लिए ग्राहक-वार
- ट्रेड क्रेडिटर्स (बिना भुगतान वाली खरीद)
- बीमा पॉलिसी नंबर, बीमित राशि और समाप्ति तारीख, बैंक का हित दर्ज
- प्रोप्राइटर, पार्टनर या अधिकृत डायरेक्टर के हस्ताक्षर
जांचें कि स्टेटमेंट आपकी किताबों, जीएसटी खरीद-बिक्री डेटा और भौतिक गिनती से मेल खाता है। बैंक अब स्टॉक स्टेटमेंट की तुलना जीएसटी रिटर्न से ज्यादा करने लगे हैं, और बड़े अंतर पर सवाल उठते हैं।
अपने बैंक से क्या पूछें
- ड्रॉइंग पावर के लिए स्टॉक और उधारी पर उम्र की कौन सी सीमा लागू है?
- क्या कच्चे माल, वर्क-इन-प्रोग्रेस और तैयार माल पर मार्जिन अलग-अलग है?
- आप किस वैल्यूएशन आधार को मानते हैं: लागत, बाजार कीमत या दोनों में कम?
- हर महीने स्टेटमेंट किस तारीख तक देना है, और देरी पर क्या चार्ज लगता है?
- स्टॉक ऑडिट या निरीक्षण कितनी बार होगा, और खर्च कौन उठाएगा?
- क्या धीमे बिकने वाले स्टॉक को पूरी तरह बाहर रखने की जगह ज्यादा मार्जिन पर शामिल किया जा सकता है?
2024 से लागू आरबीआई के पीनल चार्ज नियमों के तहत, स्टॉक स्टेटमेंट देर से देने पर कोई भी चार्ज आपकी लोन शर्तों में बताया गया पीनल चार्ज होना चाहिए, ब्याज दर में जोड़ा गया अतिरिक्त ब्याज नहीं।
आम गलतियां
- पिछले महीने के आंकड़े थोड़ा बदलकर कॉपी करना, गिनती किए बिना।
- सब कुछ खरीद लागत पर आंकना, उन आइटम समेत जिनकी कीमत गिर गई या जो फैशन से बाहर हो गए।
- वह माल शामिल करना जो आपका नहीं है, जैसे कंसाइनमेंट स्टॉक या पहले से बिका माल।
- एक ही माल दो बार गिनना, एक बार स्टॉक में और एक बार उधारी में।
- आखिरी तारीख चूकना, जिससे ड्रॉइंग पावर रुक सकती है और तीन महीने बाद निकासी अनियमित हो जाती है।
- स्टॉक मूल्य से कम बीमा, जिससे बैंक की सिक्योरिटी भी कमजोर होती है।
- डेड स्टॉक को निकालने की जगह कैश क्रेडिट लिमिट से फंड करना। शुरू से सोच-समझकर खरीदना मदद करता है; देखें सीजनल बिजनेस के लिए इन्वेंटरी प्लानिंग।
अगर ड्रॉइंग पावर बकाया से कम हो जाए
महीने के अंत से पहले ब्रांच को एक योजना के साथ लिखित में बताएं: क्लियरेंस सेल, खास उधारी की वसूली या मालिक का पैसा। पूछें कि क्या कम समय की एड-हॉक लिमिट संभव है। अगर कमी ढांचागत है, तो लिमिट का ही दोबारा आकलन चाहिए हो सकता है, या उसका एक हिस्सा टर्म लोन में बदलना पड़ सकता है; देखें वर्किंग कैपिटल लोन बनाम टर्म लोन।
शिकायत कैसे बढ़ाएं
अगर समय पर स्टेटमेंट देने के बाद भी बैंक आपकी ड्रॉइंग पावर अपडेट न करे, सैंक्शन लेटर से बाहर के चार्ज लगाए, या लिखित अनुरोधों का जवाब न दे, तो बैंक के शिकायत सेल में शिकायत करें। 30 दिन में हल न हो, या आप जवाब से संतुष्ट न हों, तो रिज़र्व बैंक – एकीकृत लोकपाल योजना, 2026 के तहत 90 दिन के भीतर cms.rbi.org.in पर शिकायत दर्ज करें। लोकपाल सेवा में कमी की जांच करता है; वह मार्जिन या लिमिट पर बैंक के व्यावसायिक फैसले को तय नहीं करता।
मुख्य बातें
- स्टॉक की एजिंग करें, उसे लागत और प्राप्त होने वाले मूल्य में से कम पर आंकें, और धीमे बिकने वाले माल को अलग दिखाएं।
- तीन महीने से पुराने स्टेटमेंट से निकासी अनियमित हो जाती है; लगातार 90 दिन की अनियमितता से NPA हो सकता है।
- उदाहरण में सही वैल्यूएशन से DP ₹34.5 लाख से घटकर ₹30 लाख हुई, और क्लियरेंस सेल ने ₹3 लाख का अंतर भरा।
- अपने सैंक्शन लेटर की एजिंग सीमा, मार्जिन और आखिरी तारीखें जानें।
- डेड स्टॉक जल्दी निकालना आउट-ऑफ-ऑर्डर खाते या फेल स्टॉक ऑडिट से सस्ता है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
क्या धीमा बिकने वाला स्टॉक बैंक स्टॉक स्टेटमेंट में दिखाना चाहिए?
दिखाएं, लेकिन उम्र के हिसाब से अलग और असली मूल्य पर। ज्यादातर सैंक्शन लेटर एक तय दिनों से पुराने स्टॉक को बाहर रखते हैं या उस पर ज्यादा मार्जिन लगाते हैं, इसलिए एजिंग कॉलम में दिखाने से बैंक अपना नियम सही लागू कर पाता है और आप ड्रॉइंग पावर बढ़ा-चढ़ाकर नहीं दिखाते।
पुराने या धीमे बिकने वाले स्टॉक का मूल्य कैसे तय करें?
अकाउंटिंग स्टैंडर्ड के अनुसार इन्वेंटरी लागत और नेट रियलाइजेबल वैल्यू में से जो कम हो, उस पर आंकी जाती है; नेट रियलाइजेबल वैल्यू यानी अनुमानित बिक्री कीमत घटाकर बेचने की लागत। जो पुराना माल सिर्फ छूट पर या कबाड़ में बिकेगा, उसे उसी असली मूल्य तक घटाएं।
ड्रॉइंग पावर के लिए स्टॉक स्टेटमेंट कितना पुराना हो सकता है?
कमर्शियल बैंकों के लिए आरबीआई के एसेट क्लासिफिकेशन निर्देशों के अनुसार, ड्रॉइंग पावर चालू स्टॉक स्टेटमेंट पर आधारित होनी चाहिए, और इसके लिए स्टेटमेंट तीन महीने से पुराना नहीं होना चाहिए। पुराने स्टेटमेंट पर आधारित बकाया अनियमित माना जाता है, और लगातार 90 दिन अनियमित निकासी से खाता NPA बन सकता है।
अगर स्टॉक स्टेटमेंट में स्टॉक बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया जाए तो क्या होता है?
आपकी ड्रॉइंग पावर असली सिक्योरिटी से ज्यादा होगी, और स्टॉक ऑडिट या निरीक्षण में आम तौर पर यह अंतर पकड़ा जाता है। बैंक लिमिट घटा सकता है, सैंक्शन शर्तों के मुताबिक पीनल चार्ज लगा सकता है, और गंभीर या जानबूझकर किए मामलों में इसे गलतबयानी या धोखाधड़ी मान सकता है।
स्टॉक स्टेटमेंट कितनी बार जमा करना होता है?
ज्यादातर बैंक अगले महीने की एक तय तारीख, जैसे 10 या 15 तारीख तक, मासिक स्टॉक स्टेटमेंट मांगते हैं। सटीक अवधि, आखिरी तारीख और देरी पर कोई चार्ज आपके सैंक्शन लेटर में लिखा होता है।
यह लेख केवल सामान्य जानकारी के लिए है, निजी वित्तीय, टैक्स या कानूनी सलाह नहीं। कोई भी फैसला लेने से पहले अपने बैंक, लेंडर या योग्य सलाहकार से पुष्टि करें।