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स्टेबलकॉइन डीपेग का खतरा: '1 डॉलर' वाले कॉइन क्यों टूटते हैं

स्टेबलकॉइन डीपेग के जोखिम: फिएट, क्रिप्टो और एल्गोरिदमिक कॉइन अपना पेग कैसे खोते हैं, पुराने डीपेग, और भारत में 30% टैक्स व 1% टीडीएस (अक्टूबर 2026)।

लेखक: Moksh Shahअपडेट: 7 मिनट में पढ़ें
स्टेबलकॉइन डीपेग का खतरा: '1 डॉलर' वाले कॉइन क्यों टूटते हैं
इस लेख में
  1. स्टेबलकॉइन क्या वादा करता है
  2. डीपेग क्यों होते हैं: पूरा तंत्र
  3. जो डीपेग सच में हुए
  4. उदाहरण: एक भारतीय होल्डर और डीपेग
  5. भारत में टैक्स और रेगुलेटरी स्थिति (अक्टूबर 2026 तक)
  6. किसी भी स्टेबलकॉइन के बारे में ये सवाल पूछें (समझने के लिए, सलाह नहीं)
  7. मुख्य बातें
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स्टेबलकॉइन तब डीपेग होता है जब उसकी बाजार कीमत उस वैल्यू से हट जाती है जिसका वह वादा करता है, आम तौर पर 1 अमेरिकी डॉलर, क्योंकि लोगों को शक होने लगता है कि वे उसे सच में उस डॉलर में बदल पाएंगे या नहीं। जोखिम इस पर निर्भर करता है कि कॉइन के पीछे क्या है: फिएट-बैक्ड कॉइन बैंकों और ट्रेजरी बिल में रखे रिजर्व की क्वालिटी और उन तक पहुंच पर निर्भर हैं, क्रिप्टो-बैक्ड कॉइन ऐसे कोलैटरल पर निर्भर हैं जो धड़ाम से गिर सकता है, और एल्गोरिदमिक कॉइन सिर्फ बाजार के भरोसे पर टिके हैं। अक्टूबर 2026 तक भारतीय यूजर्स के लिए डीपेग का नुकसान किसी दूसरी आय से सेट-ऑफ नहीं हो सकता, जबकि मुनाफे पर 30% के साथ सेस और 1% टीडीएस लगता है।

यह लेख सिर्फ जानकारी के लिए है और किसी भी स्टेबलकॉइन को खरीदने, बेचने या रखने की सलाह नहीं देता। स्टेबलकॉइन समेत क्रिप्टो एसेट भारत में लीगल टेंडर नहीं हैं।

स्टेबलकॉइन क्या वादा करता है

स्टेबलकॉइन एक क्रिप्टो टोकन है जिसे किसी रेफरेंस एसेट, ज्यादातर अमेरिकी डॉलर, के मुकाबले स्थिर कीमत पर बनाए रखने के लिए डिजाइन किया गया है। इसका पेग मोटे तौर पर तीन तरीकों से बनाए रखा जाता है:

प्रकार पेग कैसे टिका रहना चाहिए डीपेग की मुख्य वजह
फिएट-बैक्ड (जैसे USDT, USDC) जारीकर्ता नकदी, बैंक डिपॉजिट और छोटी अवधि की सरकारी सिक्योरिटीज रखता है और योग्य ग्राहकों के लिए टोकन 1:1 पर रिडीम करता है रिजर्व पर शक, रिजर्व रखने वाला बैंक डूबना, रिडेम्पशन रुकना, जारीकर्ता पर रेगुलेटरी कार्रवाई
क्रिप्टो-कोलैटरलाइज्ड (जैसे DAI जैसे डिजाइन) यूजर्स जितने स्टेबलकॉइन बनाते हैं उससे ज्यादा क्रिप्टो लॉक करते हैं; अपने-आप होने वाले लिक्विडेशन इसे ओवर-कोलैटरलाइज्ड रखते हैं कोलैटरल की कीमतों में तेज गिरावट, लिक्विडेशन सिस्टम पर बोझ, ओरेकल फेल होना
एल्गोरिदमिक एक जोड़ीदार टोकन और इंसेंटिव से सप्लाई बढ़ती-घटती है; ठोस कोलैटरल बहुत कम या नहीं भरोसा टूटने पर "डेथ स्पाइरल" शुरू होता है, जिसमें जोड़ीदार टोकन बनाकर बेचा जाता है

डीपेग क्यों होते हैं: पूरा तंत्र

1. रिडेम्पशन हर किसी के लिए खुला नहीं

ज्यादातर रिटेल होल्डर सीधे जारीकर्ता से रिडीम नहीं कर सकते; सिर्फ मंजूर संस्थाएं कर सकती हैं। रिटेल यूजर्स एक्सचेंजों और मार्केट मेकर्स पर निर्भर होते हैं, जो बाजार कीमत और रिडेम्पशन वैल्यू के बीच आर्बिट्राज करते हैं। अगर रिडेम्पशन धीमा या बंद हो जाए (वीकेंड, बैंक की छुट्टी, कानूनी रोक), तो रिजर्व मौजूद होने पर भी बाजार कीमत तेजी से गिर सकती है।

2. रिजर्व की क्वालिटी और जगह

अगर रिजर्व किसी एक बैंक में हों और वह डूब जाए, या ऐसे एसेट में हों जिन्हें पूरी कीमत पर जल्दी बेचा न जा सके, तो होल्डर दूसरों से पहले निकलने की होड़ में लग जाते हैं। यह बैंक रन जैसी ही हालत है, लेकिन डिपॉजिट इंश्योरेंस के बिना।

3. कोलैटरल का गिरना

क्रिप्टो-कोलैटरलाइज्ड कॉइन उतने ही स्थिर हैं जितनी उनकी लिक्विडेशन प्रक्रिया। अगर कोलैटरल की कीमतें पोजीशन लिक्विडेट होने से तेज गिरें, तो सिस्टम अंडर-कोलैटरलाइज्ड हो जाता है।

4. खुद पर टिका डिजाइन

एल्गोरिदमिक स्टेबलकॉइन एक साथी टोकन की मांग पर निर्भर होते हैं। भरोसा घटने पर सिस्टम वह टोकन और छापता है, उसकी कीमत गिर जाती है और पेग टूट जाता है।

5. प्लेटफॉर्म और चेन से जुड़ी दिक्कतें

किसी एक्सचेंज पर स्टेबलकॉइन वहां की लिक्विडिटी, निकासी पर रोक या उस एक्सचेंज पर रेगुलेटरी कार्रवाई की वजह से पेग से नीचे ट्रेड हो सकता है, भले ही बाकी जगह कॉइन ठीक हो। भारत में स्थानीय मांग और रुपये से खरीदने में आने वाली दिक्कतों की वजह से स्टेबलकॉइन अक्सर आधिकारिक रुपया-डॉलर रेट से प्रीमियम या डिस्काउंट पर ट्रेड हुए हैं।

जो डीपेग सच में हुए

घटना क्या हुआ नतीजा
TerraUSD (UST), मई 2022 एल्गोरिदमिक स्टेबलकॉइन से भरोसा उठा; जोड़ीदार टोकन LUNA भारी मात्रा में बनाया गया कुछ सेंट तक गिरा और कभी नहीं उबरा; कुल नुकसान दसियों अरब डॉलर तक पहुंचा
Tether (USDT), मई 2022 Terra के गिरने से फैलने का डर; भारी रिडेम्पशन (कुछ दिनों में करीब 7 अरब डॉलर रिपोर्ट हुए) थोड़े समय के लिए करीब 95 सेंट तक गिरा, कुछ दिनों में उबर गया
USD Coin (USDC), मार्च 2023 Circle ने बताया कि करीब 3.3 अरब डॉलर के रिजर्व डूबे Silicon Valley Bank में थे; वीकेंड होने से रिडेम्पशन मुमकिन नहीं था करीब 87 सेंट तक गिरा, अमेरिकी अधिकारियों के SVB जमाकर्ताओं को सुरक्षा देने के बाद उबरा

ये आंकड़े व्यापक रूप से रिपोर्ट हुए बाजार डेटा और जारीकर्ताओं के बयानों से हैं; दिन के सबसे निचले स्तर डेटा सोर्स के हिसाब से अलग हो सकते हैं। सबक यह है कि दबाव में सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाले कॉइन भी पेग से हटे हैं, और एक बड़ा डिजाइन पूरी तरह फेल हो गया।

उदाहरण: एक भारतीय होल्डर और डीपेग

रोहन एक भारतीय एक्सचेंज पर ₹90 प्रति टोकन (₹90,000) पर 1,000 USDT खरीदता है, जब आधिकारिक रुपया रेट करीब ₹88 है, यानी वह पहले ही स्थानीय प्रीमियम दे रहा है। सभी आंकड़े सिर्फ समझाने के लिए हैं।

स्थिति A: पेग बना रहता है, रुपया नहीं बदलता, वह ₹90 पर बेचता है

  • बिक्री: ₹90,000, कोई मुनाफा नहीं
  • 1% टीडीएस: ₹900 (अगर उसके सालाना ट्रांसफर सीमा से ज्यादा हैं), जो रिटर्न में क्रेडिट के रूप में क्लेम हो सकता है
  • टैक्स: शून्य, लेकिन रिटर्न भरने तक ₹900 की नकदी अटकी रहती है

स्थिति B: कुछ समय का डीपेग, वह घबराकर ₹81 (करीब 10% नीचे) पर बेच देता है

  • बिक्री: ₹81,000 → ₹9,000 का नुकसान
  • यह नुकसान सैलरी, दूसरे क्रिप्टो मुनाफे या किसी और चीज से सेट-ऑफ नहीं हो सकता, और कैरी फॉरवर्ड भी नहीं हो सकता

स्थिति C: रुपया कमजोर होता है, वह ₹93 पर बेचता है

  • मुनाफा: ₹3,000
  • टैक्स: 30% = ₹900; 4% सेस = ₹36 → ₹936
  • टैक्स के बाद शुद्ध मुनाफा: ₹2,064

यह असमानता मायने रखती है: स्थिति B में पूरा ₹9,000 का नुकसान बिना किसी टैक्स राहत के झेलना पड़ता है, जबकि स्थिति C में मुनाफे पर 31.2% (किसी सरचार्ज से पहले) टैक्स लगता है। यह भी ध्यान दें कि भारत में किसी स्टेबलकॉइन को दूसरे क्रिप्टो टोकन से बदलना भी टैक्सेबल ट्रांसफर है, भले ही इसमें रुपये शामिल न हों। यह आपकी बाकी आय के साथ कैसे बैठता है, यह देखने के लिए हमारा इनकम टैक्स कैलकुलेटर इस्तेमाल करें।

भारत में टैक्स और रेगुलेटरी स्थिति (अक्टूबर 2026 तक)

  • टैक्स: स्टेबलकॉइन वर्चुअल डिजिटल एसेट हैं। मुनाफे पर 30% के साथ सरचार्ज और 4% सेस लगता है (पुरानी धारा 115BBH, जो इनकम-टैक्स एक्ट, 2025 में लाई गई), और सिर्फ खरीद की लागत की कटौती मिलती है। ज्यादातर व्यक्तियों और HUF के लिए साल में ₹50,000 से ऊपर और बाकी के लिए ₹10,000 से ऊपर के ट्रांसफर पर 1% टीडीएस लगता है। बजट 2026 में इन दरों में कोई बदलाव नहीं हुआ।
  • लीगल टेंडर नहीं: भारत में स्टेबलकॉइन को करेंसी की तरह इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। बैंकिंग सिस्टम के बाहर क्रॉस-बॉर्डर पेमेंट के लिए इनका इस्तेमाल FEMA से जुड़ी चिंताएं पैदा करता है; रेमिटेंस लिबरलाइज्ड रेमिटेंस स्कीम के तहत ऑथराइज्ड रास्तों से ही होने चाहिए।
  • आरबीआई का रुख: आरबीआई की Financial Stability Reports में स्टेबलकॉइन समेत क्रिप्टो एसेट को लेकर सावधानी वाला रुख बताया गया है, और आरबीआई निजी स्टेबलकॉइन की जगह सेंट्रल बैंक डिजिटल करेंसी का समर्थन करता है। 2026 के मध्य की न्यूज रिपोर्ट्स के मुताबिक आरबीआई अब भी बैंकों के क्रिप्टो एक्सपोजर पर रोक को एक विकल्प मानता है; सरकार ने कोई अंतिम फ्रेमवर्क घोषित नहीं किया है।
  • एक्सचेंज: भारतीय यूजर्स को सर्विस देने वाले प्लेटफॉर्म को एंटी-मनी लॉन्ड्रिंग नियमों के तहत FIU-IND में रजिस्टर होना जरूरी है। रजिस्ट्रेशन उनकी माली हालत या खुद स्टेबलकॉइन की गारंटी नहीं है।

किसी भी स्टेबलकॉइन के बारे में ये सवाल पूछें (समझने के लिए, सलाह नहीं)

  1. इसके पीछे क्या है, और रिजर्व कहां रखे गए हैं?
  2. इसे कौन रिडीम कर सकता है, कितनी जल्दी, और कम से कम कितनी रकम पर?
  3. क्या रिजर्व रिपोर्ट का स्वतंत्र ऑडिट होता है या सिर्फ "अटेस्टेशन"?
  4. जारीकर्ता को कौन सा देश रेगुलेट करता है, और उसके डूबने पर होल्डर्स का क्या होगा?
  5. आप इसे किस प्लेटफॉर्म पर रख रहे हैं, और क्या वह प्लेटफॉर्म निकासी रोक सकता है?

टोकन एक्सचेंज पर रखने और सेल्फ-कस्टडी वॉलेट में रखने का फर्क जानने के लिए हमारी क्रिप्टो एक्सचेंज बनाम वॉलेट गाइड पढ़ें। स्टेबलकॉइन आरबीआई के जारी e₹ और यूपीआई से कैसे अलग है, यह समझने के लिए डिजिटल रुपया बनाम यूपीआई बनाम क्रिप्टो देखें।

मुख्य बातें

  • स्टेबलकॉइन का पेग उतना ही मजबूत है जितने उसके रिजर्व, रिडेम्पशन तक पहुंच और उसका डिजाइन।
  • एल्गोरिदमिक स्टेबलकॉइन पूरी तरह फेल हो चुके हैं (TerraUSD, 2022); बड़े फिएट-बैक्ड कॉइन भी कुछ समय के लिए डीपेग हुए हैं (मार्च 2023 में USDC करीब 87 सेंट तक)।
  • भारत में स्टेबलकॉइन लीगल टेंडर नहीं हैं और इन पर न डिपॉजिट इंश्योरेंस है न निवेशकों के लिए कोई खास सुरक्षा।
  • अक्टूबर 2026 तक मुनाफे पर 30% के साथ सरचार्ज और सेस लगता है, सीमा से ऊपर 1% टीडीएस लगता है, और डीपेग का नुकसान न सेट-ऑफ हो सकता है न कैरी फॉरवर्ड।
  • डॉलर स्टेबलकॉइन रखना किसी रेगुलेटेड बैंक खाते में डॉलर रखने जैसा नहीं है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

स्टेबलकॉइन के डीपेग होने का क्या मतलब है?

डीपेग तब होता है जब कोई स्टेबलकॉइन, जिसे एक तय कीमत (आम तौर पर 1 अमेरिकी डॉलर) पर ट्रेड होने के लिए बनाया गया है, बाजार में उस कीमत से काफी नीचे या ऊपर ट्रेड होने लगता है। आम तौर पर यह कॉइन के रिजर्व, रिडेम्पशन की सुविधा या उसे स्थिर रखने वाले सिस्टम पर शक दिखाता है।

क्या बड़े स्टेबलकॉइन कभी अपना पेग खो चुके हैं?

हां। एल्गोरिदमिक स्टेबलकॉइन TerraUSD मई 2022 में लगभग शून्य पर आ गया और कभी नहीं उबरा। मार्च 2023 में USDC करीब 87 सेंट तक गिर गया, जब Circle ने बताया कि उसके करीब 3.3 अरब डॉलर के रिजर्व डूबे Silicon Valley Bank में थे; जमाकर्ताओं को सुरक्षा मिलने के बाद यह उबर गया।

क्या भारत में स्टेबलकॉइन लीगल टेंडर हैं या रेगुलेटेड हैं?

नहीं। भारत में स्टेबलकॉइन लीगल टेंडर नहीं हैं और अक्टूबर 2026 तक इन्हें जारी करने के लिए कोई भारतीय रेगुलेटरी फ्रेमवर्क नहीं है। आरबीआई ने निजी तौर पर जारी स्टेबलकॉइन को लेकर बार-बार सावधानी जताई है और वह अपने डिजिटल रुपये को बेहतर मानता है।

भारत में स्टेबलकॉइन पर टैक्स कैसे लगता है?

स्टेबलकॉइन को वर्चुअल डिजिटल एसेट माना जाता है। ट्रांसफर पर किसी भी मुनाफे पर 30% के साथ सरचार्ज और 4% सेस लगता है, सालाना सीमा से ऊपर 1% टीडीएस लगता है, और नुकसान, जिसमें डीपेग से हुआ नुकसान भी शामिल है, न सेट-ऑफ हो सकता है न कैरी फॉरवर्ड।

क्या स्टेबलकॉइन किसी भारतीय को रुपये की कमजोरी से बचाता है?

अगर पेग बना रहे, तो डॉलर से जुड़ा स्टेबलकॉइन रुपये के मुकाबले डॉलर के साथ चलता है, लेकिन इसमें जारीकर्ता, प्लेटफॉर्म और डीपेग के जोखिम जुड़ जाते हैं, और रुपये के उतार-चढ़ाव से हुए मुनाफे पर भी 30% टैक्स लगता है। यह किसी रेगुलेटेड बैंक खाते में डॉलर रखने जैसा नहीं है।

यह लेख केवल सामान्य जानकारी के लिए है, निजी वित्तीय, टैक्स या कानूनी सलाह नहीं। कोई भी फैसला लेने से पहले अपने बैंक, लेंडर या योग्य सलाहकार से पुष्टि करें।

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