डेट फंड में ड्यूरेशन रिस्क बनाम क्रेडिट रिस्क
डेट फंड में ड्यूरेशन रिस्क और क्रेडिट रिस्क: ब्याज दर और डिफॉल्ट से NAV कैसे गिरता है, SEBI का रिस्क मैट्रिक्स, 2026 की कैटेगरी, टैक्स और उदाहरण।

इस लेख में
- ब्याज दरों के साथ बॉन्ड की कीमतें क्यों बदलती हैं
- ड्यूरेशन: ब्याज दर के असर को मापने वाला आंकड़ा
- क्रेडिट रिस्क: जब कर्ज लेने वाला भुगतान नहीं करता
- आमने-सामने तुलना
- डेट फंड की कैटेगरी और उनके मुख्य जोखिम
- पोटेंशियल रिस्क क्लास (PRC) मैट्रिक्स
- निवेश की अवधि के हिसाब से कैसे चुनें
- टैक्स: दोनों जोखिमों के लिए एक जैसा
- मुख्य बातें
डेट फंड में दो अलग तरीकों से नुकसान हो सकता है। ड्यूरेशन रिस्क (इंटरेस्ट रेट रिस्क) ब्याज दरें बढ़ने पर बॉन्ड की कीमतों में आने वाली गिरावट है; काफी समय तक निवेश बनाए रखने वाले के लिए यह आम तौर पर अस्थायी होती है। क्रेडिट रिस्क वह नुकसान है जो कर्ज लेने वाले के डिफॉल्ट करने या उसकी रेटिंग घटने पर होता है; यह स्थायी भी हो सकता है। आप कौन सा जोखिम और कितना ले रहे हैं, यह जानना डेट फंड खरीदने से पहले जांचने वाली सबसे काम की बात है।
ब्याज दरों के साथ बॉन्ड की कीमतें क्यों बदलती हैं
बॉन्ड पर तय ब्याज मिलता है। अगर खरीदने के बाद बाजार में ब्याज दरें बढ़ जाएं, तो नए बॉन्ड ज्यादा ब्याज देते हैं, इसलिए खरीदार के लिए आपका पुराना बॉन्ड कम कीमती हो जाता है और उसकी कीमत गिर जाती है। अगर दरें घटती हैं, तो आपके बॉन्ड का ज्यादा कूपन और कीमती हो जाता है और उसकी कीमत बढ़ जाती है। डेट फंड का NAV उसके सभी बॉन्ड की बाजार कीमत होता है, इसलिए यह भी इसी तरह चलता है। कूपन, कीमत और यील्ड का पूरा गणित समझने के लिए पढ़ें बॉन्ड कूपन बनाम यील्ड टू मैच्योरिटी।
ड्यूरेशन: ब्याज दर के असर को मापने वाला आंकड़ा
फंड फैक्टशीट में ड्यूरेशन के दो आंकड़े होते हैं:
- मैकाले ड्यूरेशन वह औसत समय (सालों में) है जिसमें आपको बॉन्ड से कैश फ्लो मिलते हैं, यानी वेटेड एवरेज। SEBI इसी से डेट फंड की कैटेगरी तय करता है।
- मॉडिफाइड ड्यूरेशन इसे कीमत पर असर में बदलता है: मॉडिफाइड ड्यूरेशन = मैकाले ड्यूरेशन ÷ (1 + यील्ड)। यह बताता है कि यील्ड में 1 प्रतिशत अंक के बदलाव पर NAV लगभग कितने प्रतिशत बदलेगा।
उदाहरण: ब्याज दर बढ़ने का असर (समझने के लिए)
एक फंड की मैकाले ड्यूरेशन 6.42 साल है और पोर्टफोलियो की यील्ड टू मैच्योरिटी (YTM) 7% है। ये आंकड़े सिर्फ समझाने के लिए हैं।
- मॉडिफाइड ड्यूरेशन = 6.42 ÷ 1.07 = 6.0
- अगर यील्ड 0.50 प्रतिशत अंक बढ़ती है, तो NAV में अनुमानित बदलाव = −6.0 × 0.50% = −3.0%
- ₹5,00,000 के निवेश पर यह करीब ₹15,000 की तुरंत मार्क-टू-मार्केट गिरावट है
यील्ड 0.50 अंक घटने पर यही फंड करीब 3.0% (₹15,000) बढ़ता है। यह अनुमान है और ब्याज दरों में छोटे बदलाव पर सबसे सही बैठता है।
अब एक लिक्विड फंड से तुलना करें, जिसकी मॉडिफाइड ड्यूरेशन (उदाहरण के तौर पर) 0.10 है। उसी 0.50 अंक की बढ़ोतरी से इसका NAV करीब −0.10 × 0.50% = −0.05% बदलता है, यानी ₹5,00,000 पर ₹250।
ड्यूरेशन से हुआ नुकसान अक्सर अस्थायी क्यों होता है
बॉन्ड पर ब्याज मिलता रहता है, और फंड मैच्योर होने वाला पैसा नई, ऊंची यील्ड पर दोबारा लगाता है। मोटे तौर पर, अगर इसके बाद दरें स्थिर रहें, तो ब्याज दर से आई गिरावट की भरपाई लगभग उसकी ड्यूरेशन जितने समय में हो जाती है। उदाहरण में 7% यील्ड से ₹5,00,000 पर साल में करीब ₹35,000 मिलते हैं (7% × ₹5,00,000), जो ₹15,000 की गिरावट से ज्यादा है, इसलिए एक साल तक रखने वाला निवेशक फिर भी फायदे में रह सकता है। यह सिर्फ उदाहरण है और इसमें माना गया है कि दरें और नहीं बढ़तीं और कोई डिफॉल्ट नहीं होता।
क्रेडिट रिस्क: जब कर्ज लेने वाला भुगतान नहीं करता
क्रेडिट रिस्क का ब्याज दरों के बदलाव से कोई लेना-देना नहीं है। यह इस बात की आशंका है कि जिस कंपनी के बॉन्ड फंड के पास हैं, वह:
- डाउनग्रेड हो जाए, यानी रेटिंग एजेंसी उसकी रेटिंग घटा दे, जिससे बॉन्ड की कीमत गिरती है, या
- डिफॉल्ट कर दे, जिससे ब्याज और मूलधन देर से मिले या कभी न मिले।
उदाहरण: डिफॉल्ट का असर (समझने के लिए)
एक फंड के पोर्टफोलियो का 5% एक कंपनी के बॉन्ड में है। वह कंपनी डिफॉल्ट करती है और फंड उन बॉन्ड की कीमत शून्य कर देता है।
- NAV पर असर: करीब −5%
- ₹5,00,000 पर: करीब ₹25,000 का नुकसान
ड्यूरेशन वाले उदाहरण के उलट, यहां ऊंची यील्ड से अपने-आप भरपाई नहीं होती। पैसा तभी वापस आता है जब कंपनी बाद में कुछ चुकाती है।
जब कोई होल्डिंग इन्वेस्टमेंट ग्रेड से नीचे डाउनग्रेड हो या डिफॉल्ट करे, तो SEBI फंड को सेग्रिगेटेड पोर्टफोलियो (साइड पॉकेट) बनाने की इजाजत देता है। मुश्किल में फंसे बॉन्ड को अलग पोर्टफोलियो में रख दिया जाता है, और उस तारीख के हर निवेशक को उसमें यूनिट मिलती हैं। आपका मुख्य NAV उस बॉन्ड की कीमत जितना घट जाता है, लेकिन अगर कंपनी बाद में भुगतान करती है, तो वह पैसा इन सेग्रिगेटेड यूनिट में आता है। इससे नए निवेशक दूसरों की कीमत पर फायदा नहीं उठा पाते और जल्दी निकलने वाले नुकसान से बच नहीं पाते। लेकिन इससे नुकसान खत्म नहीं होता।
भारतीय निवेशकों ने ये दोनों जोखिम होते देखे हैं: 2018 में IL&FS का डिफॉल्ट और 2020 में फ्रैंकलिन टेम्पलटन का छह डेट स्कीम बंद करने का फैसला दिखाता है कि "डेट" का मतलब "सुरक्षित" नहीं है।
आमने-सामने तुलना
| ड्यूरेशन (ब्याज दर) रिस्क | क्रेडिट रिस्क | |
|---|---|---|
| कब होता है | बाजार में यील्ड बढ़ने पर | कर्ज लेने वाला डाउनग्रेड या डिफॉल्ट हो |
| NAV पर असर | धीरे-धीरे या अचानक गिरावट, दरें घटें तो बढ़त | अचानक गिरावट, बड़ी हो सकती है |
| क्या आम तौर पर अस्थायी है? | अक्सर, अगर ड्यूरेशन जितने समय तक रखें | स्थायी हो सकता है |
| कैसे मापते हैं | मैकाले और मॉडिफाइड ड्यूरेशन | रेटिंग मिक्स, क्रेडिट रिस्क वैल्यू |
| सबसे ज्यादा | लॉन्ग ड्यूरेशन, गिल्ट, डायनामिक फंड | क्रेडिट रिस्क फंड, कम रेटिंग वाले कॉर्पोरेट पेपर |
| सबसे कम | ओवरनाइट, लिक्विड, मनी मार्केट फंड | सरकारी सिक्योरिटीज, ट्रेजरी बिल, AAA पेपर |
डेट फंड की कैटेगरी और उनके मुख्य जोखिम
SEBI ज्यादातर डेट कैटेगरी मैकाले ड्यूरेशन से तय करता है। 20 मार्च 2026 के मास्टर सर्कुलर के तहत कई कैटेगरी के नाम बदले गए; कई फंड हाउस ने अगस्त 2026 से नए नाम लागू किए। उदाहरण के लिए, "Short Duration Fund" अब "Short Term Fund" है और "Low Duration Fund" अब "Ultra Short to Short Term Fund" है। अक्टूबर 2026 की स्थिति में नीचे दी गई कैटेगरी के ड्यूरेशन बैंड नहीं बदले।
| कैटेगरी (पुराना नाम ब्रैकेट में) | मैकाले ड्यूरेशन | किस जोखिम पर नजर रखें |
|---|---|---|
| ओवरनाइट | 1 दिन | दोनों बहुत कम |
| लिक्विड | 91 दिन तक मैच्योरिटी | कम; क्रेडिट क्वालिटी जांचें |
| अल्ट्रा शॉर्ट टर्म (अल्ट्रा शॉर्ट ड्यूरेशन) | 3 से 6 महीने | ड्यूरेशन रिस्क कम |
| अल्ट्रा शॉर्ट टू शॉर्ट टर्म (लो ड्यूरेशन) | 6 से 12 महीने | ड्यूरेशन कम, कुछ क्रेडिट |
| शॉर्ट टर्म (शॉर्ट ड्यूरेशन) | 1 से 3 साल | मध्यम ड्यूरेशन |
| मीडियम टर्म (मीडियम ड्यूरेशन) | 3 से 4 साल | ज्यादा ड्यूरेशन, अक्सर क्रेडिट भी |
| मीडियम टू लॉन्ग टर्म (मीडियम टू लॉन्ग ड्यूरेशन) | 4 से 7 साल | ऊंची ड्यूरेशन |
| लॉन्ग ड्यूरेशन | 7 साल से ज्यादा | बहुत ऊंची ड्यूरेशन |
| गिल्ट | तय नहीं; कम से कम 80% सरकारी सिक्योरिटीज में | ड्यूरेशन, क्रेडिट रिस्क लगभग नहीं |
| क्रेडिट रिस्क | कोई बैंड नहीं; कम से कम 65% सबसे ऊंची रेटिंग से नीचे के बॉन्ड में | ऊंचा क्रेडिट रिस्क |
बदलाव के इस दौर में अलग-अलग फंड हाउस में कैटेगरी के नाम और कुछ नियम थोड़े अलग हो सकते हैं, इसलिए स्कीम का अपना नोटिस या फैक्टशीट पढ़ें।
पोटेंशियल रिस्क क्लास (PRC) मैट्रिक्स
हर डेट स्कीम अपने डॉक्यूमेंट में 3 × 3 का एक ग्रिड दिखाती है, जो बताता है कि फंड अधिकतम कितना जोखिम ले सकता है:
| ब्याज दर रिस्क ↓ / क्रेडिट रिस्क → | अपेक्षाकृत कम (A) | मध्यम (B) | अपेक्षाकृत ज्यादा (C) |
|---|---|---|---|
| अपेक्षाकृत कम (क्लास I) | A-I | B-I | C-I |
| मध्यम (क्लास II) | A-II | B-II | C-II |
| अपेक्षाकृत ज्यादा (क्लास III) | A-III | B-III | C-III |
क्लास I से III इस पर निर्भर है कि फंड अधिकतम कितनी मैकाले ड्यूरेशन रख सकता है (1 साल तक, 3 साल तक, या कोई भी)। A से C न्यूनतम क्रेडिट रिस्क वैल्यू पर निर्भर है, जो पोर्टफोलियो की रेटिंग का वेटेड स्कोर है। A-I वाला फंड सबसे कंजर्वेटिव है; C-III वाला दोनों जोखिम सबसे ज्यादा ले सकता है। PRC एक ऊपरी सीमा है, मौजूदा स्थिति नहीं, इसलिए इसे लेटेस्ट फैक्टशीट के साथ देखें।
निवेश की अवधि के हिसाब से कैसे चुनें
| पैसे की जरूरत कब है | निवेशक आम तौर पर कौन सी कैटेगरी देखते हैं |
|---|---|
| कुछ दिन से 3 महीने | ओवरनाइट, लिक्विड |
| 3 से 12 महीने | मनी मार्केट, अल्ट्रा शॉर्ट टर्म |
| 1 से 3 साल | शॉर्ट टर्म, कॉर्पोरेट बॉन्ड, बैंकिंग और PSU डेट |
| 3 साल से ज्यादा, उतार-चढ़ाव सह सकते हैं | गिल्ट, डायनामिक, लंबी ड्यूरेशन वाले फंड |
मोटा नियम यह है कि फंड की मैकाले ड्यूरेशन आपकी निवेश अवधि के बराबर या उससे कम रखें, और जब तक आप जानबूझकर क्रेडिट रिस्क न लेना चाहें, टॉप रेटिंग वाले पोर्टफोलियो को तरजीह दें। बैंक एफडी से तुलना करें, जिस पर अक्टूबर 2026 की स्थिति में प्रति जमाकर्ता प्रति बैंक ₹5 लाख तक DICGC बीमा मिलता है; इसके लिए एफडी कैलकुलेटर इस्तेमाल करें। यह सामान्य जानकारी है, व्यक्तिगत सलाह नहीं।
टैक्स: दोनों जोखिमों के लिए एक जैसा
अक्टूबर 2026 की स्थिति में, 1 अप्रैल 2023 या उसके बाद खरीदी गई डेट फंड यूनिट को बेचने पर होल्डिंग अवधि चाहे जो हो, आपके स्लैब रेट से टैक्स लगता है। इस तारीख से पहले खरीदी और 24 महीने से ज्यादा रखी यूनिट पर बिना इंडेक्सेशन 12.5% टैक्स लगता है। विस्तार से जानने के लिए देखें म्यूचुअल फंड पर कैपिटल गेन टैक्स, और पोर्टफोलियो में डेट की जगह समझने के लिए शेयर बनाम बॉन्ड बनाम सोना।
मुख्य बातें
- ड्यूरेशन रिस्क ब्याज दरें बढ़ने से आता है और अक्सर अस्थायी होता है; क्रेडिट रिस्क डिफॉल्ट और डाउनग्रेड से आता है और स्थायी हो सकता है।
- मॉडिफाइड ड्यूरेशन ≈ यील्ड में 1 अंक के बदलाव पर NAV में % बदलाव: उदाहरण में 6.0 × 0.50% = 3.0%, यानी ₹5 लाख पर ₹15,000।
- शून्य की गई 5% होल्डिंग NAV को करीब 5% घटा देती है; साइड पॉकेट उसे अलग कर देता है, पर नुकसान खत्म नहीं करता।
- निवेश से पहले मैकाले ड्यूरेशन, रेटिंग मिक्स और PRC सेल जांचें; ड्यूरेशन को अपनी निवेश अवधि के मुताबिक रखें।
- अक्टूबर 2026 की स्थिति में अप्रैल 2023 के बाद की डेट फंड यूनिट पर स्लैब रेट से टैक्स लगता है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
क्या डेट म्यूचुअल फंड नेगेटिव रिटर्न दे सकते हैं?
हां। ब्याज दरों में तेज बढ़ोतरी से लंबी ड्यूरेशन वाले फंड का NAV कुछ समय के लिए गिर सकता है, और पोर्टफोलियो के किसी बॉन्ड के डिफॉल्ट या डाउनग्रेड होने पर उसे रखने वाले किसी भी डेट फंड का NAV घट सकता है। डेट फंड बैंक डिपॉजिट की तरह गारंटीड नहीं होते।
ड्यूरेशन रिस्क और क्रेडिट रिस्क में क्या फर्क है?
ड्यूरेशन रिस्क ब्याज दरें बढ़ने से होने वाला नुकसान है, जिससे मौजूदा बॉन्ड की कीमत घटती है; अगर आप काफी समय तक निवेश बनाए रखें तो यह आम तौर पर अस्थायी होता है। क्रेडिट रिस्क कर्ज लेने वाले के भुगतान न करने या उसकी रेटिंग घटने से होने वाला नुकसान है, जो स्थायी भी हो सकता है।
किसी डेट फंड की ड्यूरेशन और क्रेडिट क्वालिटी कैसे पता करें?
हर महीने के फैक्टशीट में मैकाले ड्यूरेशन, मॉडिफाइड ड्यूरेशन, यील्ड टू मैच्योरिटी और होल्डिंग्स का रेटिंग के हिसाब से ब्योरा होता है। स्कीम डॉक्यूमेंट में दिया पोटेंशियल रिस्क क्लास मैट्रिक्स दोनों जोखिमों को एक ही ग्रिड में दिखाता है।
किस डेट फंड में सबसे कम जोखिम है?
ओवरनाइट और लिक्विड फंड में ब्याज दर का जोखिम सबसे कम होता है, क्योंकि इनकी होल्डिंग्स एक दिन से लेकर 91 दिन तक में मैच्योर हो जाती हैं। क्रेडिट रिस्क इस पर निर्भर करता है कि इनमें क्या है, इसलिए यह भी देखें कि होल्डिंग्स मुख्य रूप से सरकारी सिक्योरिटीज, ट्रेजरी बिल या टॉप रेटिंग वाले पेपर में हों।
2026 में डेट फंड के मुनाफे पर टैक्स कैसे लगता है?
अक्टूबर 2026 की स्थिति में, 1 अप्रैल 2023 या उसके बाद खरीदी गई डेट फंड यूनिट का मुनाफा आपकी आय में जुड़ता है और होल्डिंग अवधि चाहे जो हो, आपके स्लैब रेट से टैक्स लगता है। इससे पहले की यूनिट 24 महीने से ज्यादा रखने पर बिना इंडेक्सेशन 12.5% टैक्स लगता है।
यह लेख केवल सामान्य जानकारी के लिए है, निजी वित्तीय, टैक्स या कानूनी सलाह नहीं। कोई भी फैसला लेने से पहले अपने बैंक, लेंडर या योग्य सलाहकार से पुष्टि करें।